Raja

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Written by: Mundrika Prasad Singh

आज ना जाने क्यूँ मेरा ह्रदय उद्वेलित हो रहा है. मन ही मन किसी को मैं शायद खोज रहा हूँ. शायद… शायद… नहीं, ठीक से कुछ याद नहीं आ रहा है. बस कुछ धुंधली सी तस्वीरें मेरे जहन में कौंध रही हैं. उन तस्वीरों को अपने मानस पटल से समेटने की कोशिश करते करते मैं कब नींद के आगोश में खो गया पता ही नहीं चला.

और फिर……. जैसे यादों का कारवां निकल पड़ा.

नहीं, मैं उसका सही नाम तो नहीं जनता पर उसने बस यही कहा था… लोग उसे “राजा” के नाम से पुकारते हैं. मैं उससे करीबन दो या तीन महीने पहले मिला था. वह बाणीबिहार ट्रैफ़िक चौराहे पर भीख मांग रहा था. गाड़िओं की लम्बी कतार लगी हुई थी. मैं अपनी बोरीअत को मिटाने के लिए जैसे ही कार के एफ.एम. रेडियो से गाने सुनने लगा, हठात एक मैले कुचैले लड़के की आवाज आई….

“सा’ब….. कुछ पैसे दो”. मैंने उसे पहले तो तिरस्कार की नजरों से देखते हुए दुत्कारा और भाग जाने को इशारा किया, पर वह अभी भी वहीँ खड़ा अपनी बातें दोहराते हुए मेरी गाड़ी के सिसे को फीकी मुस्कान के साथ खटखटाने लगा.वह शांत था पर उसकी आँखें बोल रही थी.उसकी मासुमिअत ने मेरे ह्रदय को जैसे छू सा गया. नहीं मालुम, उसकी आँखों में क्या छुपा था, पर इतना तो तय था कि कहीं न कहीं कुछ तो बात है.एक बार फिर उसे देखा…. वह बचपन के उस दौर से गुजर रहा था जब माँ-बाप के साए से निकल कर उन्मुक्त गगन की ओर, अपनी बाहें फैलाए, उड़ान भरने को उताबला होता है.उम्र शायद यही कोई ६/७ साल का रहा होगा.फटेहाल कपडे, हाथ में टूटी हुई थाली, जिसमें कुछ छुट्टे पैसे पड़े हुए थे.साधारणतः ऐसे लड़कों को मैं कभी कुछ नहीं देता, पर मुझे आज न जाने क्या हुआ, अपना पर्स देखा,उसमें केवल दस और सौ-सौ के कुछ नोट पड़े हुए थे. जाहिर था मैं एक दस का नोट निकाला और उसकी ओर बढ़ा दिया. उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं उसके साथ मजाक कर रहा हूँ .फिर कुछ सोंचकर नोट मेरे हाथ से लेते हुए धीरे से मुस्कुराया जिसे मैं समझ न सका.

 “तुम्हारा नाम क्या है”.उसे हाथ के इशारे से बुलाकर मैंने यूहीं पूछा लिया, पर वह चुपचाप खड़ा रहा. मेरे दुबारा पूछने पर उसने महीन सी आवाज में बोला- …”मेरा असली नाम क्या है नहीं मालूम सा’ब , पर मुझे लोग ‘राजा’ कहते हैं” कहते हुए भयभीत हो इधर-उधर देखने लगा, शायद किसी से डर रहा हो.

 “तुम पढ़ना-लिखना चाहते हो”? मैंने धीरे से पूछा. उसने इधर उधर देखा, फिर अपना सर “हाँ” में हिलाया और भागकर भीड़ में कहीं खो गया. ट्राफीक की हरी संकेत पर गाडिओं के आगे बढ़ने के साथ ही मैं भी अपने गंतब्य स्थल की ओर बढ़ने पर मजबूर हो गया हालाकि मैं उसके बारे में और भी जानना चाहता था.

इसके बाद मैं, जब भी बाणीबिहार चौराहे से गुजरता, मेरी आँखें “राजा” को जरूर ढूंढती. मैं उसे अपने साथ ले जाने और पढाने  की चाहत अपने दिल में दबाये, आगे बढ़ जाता. वह फिर कभी नहीं दिखाई दिया, न यहाँ, न किसी और चौराहे पर. पता नहीं, वह कहाँ और किस हाल में होगा.

आज मैंने फिर उसे देखा…. बहुत दिनों के बाद…. उसी चौराहे पर, जहां पहली बार देखा था. इधर से ही गुजर रहा था. यहाँ हमेसे ट्रैफिक जाम रहता है .मैं आदतन, समय बिताने के लिए म्यूजिक सिस्टम से अपनी पसंद का गजल का आनंद ले रहा था तभी ……..

“सलाम..सलाम सा’ब” किसी की आवाज ने मेरा ध्यान भंग कर दिया. यह सोचकर की कोई भिखारी होगा, मैंने कहा…..”नहीं, भागो यहाँ से, छुट्टे नहीं है मेरे पास”.

“नहीं.. सा’ब…..मैं भीख नहीं मांग रहा हूँ…..शायद आपने…. पहचाना नहीं मुझे…. देखो… मैं राजा हूँ सा’ब ”. उसने बहुत ही भोले अंदाज में मेरा ध्यान अपनी तरफ खींचा. “पिछली बार  यहीं पर आपने मुझे दस रूपए देकर, भीख नहीं मांगने और  पढने के लिए कहा था सा’ब…..”

“अरे हाँ…….तुम ? राजा ? असल में मैं तुम्हें उसी दिन से खोज रहा था”. “लेकिन तुम फिर से……..?.”

“नहीं … नहीं.. सा’ब…देखो… आज मैं भीख नहीं माग रहा हूँ.

“देखो… गर्मी से बचने के लिए कार का एक सामान बेच रहा हूँ.” और मैंने देखा, सचमुच में उसके हाथ  में कुछ कार प्रोडक्ट्स थे जो अक्सर गर्मिओं में लोग, चौराहों पर बेचा करते हैं.

मुझे जितनी ख़ुशी हुई उतना ही आश्चर्य हुआ. क्या इस स्तर का कोई लड़का इतनी जल्दी ठीक रास्ते पर आ सकता है ? मैं इसी उधेड़बून में था कि उसके एक और खुलासे ने मेरा दिमाग ही हिला दिया.

“सा’ब मैंने पढ़ाई भी शुरू कर दी है.ये सब आप की ही मेहरबानी है सा’ब…”    “कैसे, कब, और कहाँ” ? मैंने अपनी उत्सुकता को दबाते हुए पूछा…..

“स्टेशन पर एक दीदी, कुछ हम जैसे बच्चों को हर रविवार सुबह पढ़ाया करती हैं. मुझे पढ़ने का बहुत शौक था सा’ब”.  “रोज दूर से ही मैं चुपचाप उन बच्चों को पढ़ते देखा करता. एक दिन न जाने कैसे, टीचर दीदी की नजर मुझ पर पड़ गई और मुझे बुलाकर कहा कि अगर पढ़ना चाहते हो तो हर रविवार सुबह ७ बजे यहीं पर आ जाना. और फिर क्या था सा’ब, पढ़ना-लिखना शुरू. टीचर दीदी बहुत अच्छी हैं सा’ब”.

यह सब उसने एक ही सांस में कह डाला. “अरे वाह…ये तो बड़ी अच्छी खबर सुनाई तूने”. तभी पीछे से‍ गाडिओं के हॉर्न की आवाजें  सुनाई देने लगी, शायद, ट्राफिक का संकेत हरा हो चला था. धीरे धीरे सब लोग आगे बढ़ने लगे. मैं उससे प्रोडक्ट का एक सेट लेकर जल्दीबाजी में उसे एक ५०० का नोट थमाया और फिर आगे बढ़ गया.

“सा’ब….सा’ब… मेरे पास छुट्टे नहीं हैं”…. कहते हुए मेरी गाड़ी  के पीछे भागता आ रहा था. मेरे कानों में उसकी मलिन होती हुई आवाज सुनाई दे रही थी. मैंने उसे अपने हाथ के इशारों में कहा… कोई बात नहीं… और अपने ऑफिस की तरफ चल पड़ा.

अगले रविवार तड़के, मैं रेलवे स्टेशन पर आ पहुंचा. न जाने क्यूँ मेरे मन में कुछ संदेह उठ रहे थे जैसे कहीं वह लड़का मुझे बेवकूफ तो नहीं बना रहा. यही सोंचते सोंचते स्टेशन के प्रवेश द्वार पर एक स्टाफ से टीचर के बारे में पूछा. उसने बताया कि पार्सल ऑफिस के पास एक खाली जगह पर कुछ बच्चे पढ़ते हैं. मेरे पैर उस तरफ उठते चले गए. थोड़ी दूर जाकर देखा एक खुबसूरत सी महिला जिसकी उम्र यही तक़रीबन ४० होगी, कुछ अनाथ-से बच्चों को पढ़ाने में ब्यस्त थी. मेरी आँखें उन बच्चों के बीच राजा को खोज रही थी, पर राजा का कहीं नामों निशाँ नहीं था. मैं तो सन्न रह गया. मन में तरह तरह के ख्याल आने लगे. मैंने क्यों इतनी जल्दी इस लड़के पर बिस्वास कर बैठा. यह लड़का भी औरों की भाँति चकमा दे गया शायद. आगे से फिर कभी किसी पर बिस्वास नहीं कर पाउँगा. लेकिन फिर भी मेरा मन चाह रहा था कि मेरी यह आशंका गलत साबित हो. भारी मन से धीरे धीरे रेलवे के निकास द्वार पर घर लौटने के लिए जैसे ही आया एक लड़का खून से सना हुआ अन्दर भागा  आ रहा था.  वह जैसे ही और नजदीक आया…..

अरे.. ये तो “राजा” है. कुछ पूछने के बजाय मैंने उसे रेलवे चिकित्सालय ले जाकर प्राथमिक उपचार करवाया.  कंपाऊंडर के मुताबिक़, जख्म ज्यादा गहरा नहीं था. “चिंता की कोई बात नहीं. आप इसे घर ले जा सकते हैं”. “सर” लेकिन आप कौन हैं ? इसके पहले आपको कभी इसके साथ नहीं देखा.? मेरे कुछ कहने के पहले ही वह बोल पड़ा…”सर..इस लडके को मैं कई दिनों से ..शायद…पिछले महीने से ही देख रहा हूँ….. यह उस सुजाता दीदी, जो गरीब बच्चों को प्लेटफार्म न.१ पर पढ़ाया करती है, के पास पढ़ने आ रहा है”. मन ही मन मुझे अपनी गलती का एहसास हो चला था, पछता रहा था और अपने आप को कोस रहा था. घायल होने की वजह जब मैंने राजा से पूछा तो सी सिहरन उसके चेहरे पे आया और बताने वह एक अजीब ही जा रहा था लेकिन फिर चुप्पी साध ली. मैं भी उसके इस हालत में और ज्यादा कुरेदना मुनासिब नहीं समझा. सोंचा, फिर कभी.

तय कर लिया था आज, कि मैं “राजा” से मिलना जारी रखूँगा और जितना हो सकता है, उसकी पढ़ाई और जिंदगी में आगे बढ़ने में भरसक मदद करूंगा.

 राजा को मैं उस दिन रेलवे स्टेशन पर प्राथमिक उपचार के बाद, उसके टीचर के पास छोड़ आया था. घर लौटने के बाद से ही मैं राजा की आगे की पढाई के बारे में सोचता रहता. कैसे मैं उसकी मदद करूँ ? बार बार उसकी भोली सी सूरत मेरी नज़रों के सामने आ जाती थी. उस दिन को याद करके ही मैं सिहर उठता हूँ. बाणीबिहार ट्राफिक चौराहे पर, पहली बार उससे जिस परिस्थिति में मुलाकात हुई थी और जिस आतुर और भय-मिश्रित नजरों से नि:शब्द हमसे जैसे कह रहा हो..”सा”ब मुझे इस दलदल से निकालो.”

मुझे लग रहा था जैसे कही कुछ न कुछ उसके साथ गलत हो रहा है.

  अगले रविवार सुबह मेरे कदम अपने आप रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ते चले गए. जिस जगह बच्चे पढ़ते थे वहाँ जाकर देखा… जहां, कुछ बच्चे जमीं पर बैठ कर पढ़ने का उपक्रम कर रहें हैं वहीँ दुसरे, आपस में फुसफुसा रहे हैं. मैंने मोबाइल फोन देखा..करीब आठ बज चुके थे पर टीचर का कहीं पता नहीं था.शायद आज नहीं आ पायी किसी कारण से. पास आकर देखा… राजा टीचर के आने की राह देख रहा था. मुझे देख, उठ खड़ा हुआ और बोला… “सा’ब आप यहाँ ? कब आये ? कहीं बाहर जा रहे हैं ?”

उसे जबाब देने के बजाये मैंने पूछा… “आज टीचर जी नहीं आयी क्या ? ”क्या बात है ?”

“हमें नहीं मालुम सा’ब”. “जबसे पढ़ा रही है, ऐसा कभी नहीं हुआ. हमेसे सही वक्त पर आती थी”.

“अच्छा…हो सकता है उन्हें कुछ काम आ गया हो” “कुछ अता पता उनके रहने का, तुममें से किसी को मालूम है?  मैंने सबसे पूछा”

“हाँ साब मुझे मालुम है.” और उसने मुझे एक कागज का टुकड़ा थमा दिया जिसपे पता लिखा था. मैंने बच्चों से अपने- अपने  घर जाने के लिए कह लौट आया.

दिन भर के काम को निपटाकर मैं अपने नये स्कूटर से राजा के दिए हुए पते पर चल पड़ा. पूछताछ करते करीब आधे घंटे के बाद एक आलिशान मकान के सामने खड़ा था. दरबाजे की घंटी बजाने पर एक अधेड़ उम्र की महिला के पूछने पर, मैं अपने आने के मकसद से अवगत कराया. उसने इंगित से मुझे मकान के पीछे बने एक आउटहाउस की तरफ जाने को कहा. वहाँ जाकर देखा…दरबाजे पर ताला लगा था. शायद कहीं बाहर गयी थी . जैसे ही मैं लौटने को था, मेन गेट से टीचरजी को अन्दर आते देखा.

मुझे देख, सकुचाते हुए पूछा….”आप..आप किसे खोज रहे हैं? शायद गलत पते पर आ गए हैं”.